This is the official website of Sh. Suresh Kaushik, working as Hindi Officer in Defence Accounts Department (D.A.D). He has served the Nation and National Language from past 30 years.
Hippopotomonstrosesquipedaliophobiaका सही उच्चारण करने मेंज्यादातर लोगों के पसीने छूट सकते हैं, लेकिन बेंगलुरु के शिशिर हथवार 35 अक्षरोंवाले इस शब्द का न सिर्फ सीधा, बल्कि उल्टी तरफ से भी हिज्जों का सटीक उच्चारण करतेहैं। उन्हें गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह दी गई है। उक्त शब्द काआशय उस भय से है जो बड़े अक्षरों वाले शब्दों को याद करने में आने वाली कठिनाई कोदर्शाता है। शिशिर सरकारी क्षेत्र की कंपनी भेल में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर हैं।उन्होंने इसी सप्ताह एक मिनट और 22.53 सेकेंड में 50 शब्दों के हिज्जों का बिनाकिसी गलती के उच्चारण किया। उन्होंने केरल के निवासी जॉब पोटास के रिकॉर्डको तोड़ा है। पोटास ने वर्ष 2010 में 50 शब्दों के हिज्जों का एक मिनट और 40.14 सेकेंड में उच्चारण किया था। इन दोनों से पहले यह रिकॉर्ड ब्रिटेन के निवासी देबोराप्रेबल के नाम था। शिशिर ने 17 सेकेंड के अंतर से नया रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया।उन्होंने इस दौरान छह अक्षरों वाले 20, सात अक्षरों वाले 15 और आठ अक्षरों वाले 15 शब्दों का उच्चारण किया। एक शब्द के उच्चारण में 1.6 सेकंड कासमय - शिशिर ने कहा कि मैंने एक शब्द के हिज्जे के उच्चारण में औसतन 1.6 सेकंड का समय लिया और इस अवधि में शब्द का उच्चारण भी किया। यू ट्यूब पर पोटास कीक्लिप देखने के बाद शिशिर ने भी कुछ ऐसा ही करने का फैसला किया। शिशिर कहतेहैं कि उन्होंने थॉमस हार्डी, जॉर्ज एलियट और चाल्र्स डिकेंस जैसे लेखकों कीपुस्तकें भी पढ़ीं। शिशिर न सिर्फ शब्दों पर महारत रखते हैं, बल्कि वह एक बेहतरीनधावक भी हैं।
ओम जय जगदीश, स्वामी जय जगदीश हरे भक्त जनों केसंकट, क्षण में दूर करे
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का सुख-सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति दीनबंधु दुःखहर्ता, तुम रक्षक मेरे. करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पडा तेरे विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा ओम जय जगदीश, स्वामी जय जगदीश हरे
ओम जय जगदीश की आरती जैसे भावपूर्ण गीत के रचयिता थे पं. श्रध्दाराम शर्मा। प.श्रध्दाराम शर्मा का जन्म 1837 में पंजाब के लुधियाना के पास फुल्लौर में हुआ था।उनके पिता जयदयालु खुद एक अच्छे ज्योतिषी थे। उन्होंने अपने बेटे का भविष्य पढ़लिया था और भविष्यवाणी की थी कि यह एक अद्भुत बालक होगा। बालक श्रध्दाराम को बचपनसे ही धार्मिक संस्कार तो विरासत में ही मिले थे। उन्होंने बचपन में सात साल कीउम्र तक गुरुमुखी में पढाई की। दस साल की उम्र में संस्कृत, हिन्दी, पर्शियन, ज्योतिष, और संस्कृत की पढाई शुरु की और कुछ ही वर्षो में वे इन सभी विषयों केनिष्णात हो गए। पं. श्रध्दाराम ने पंजाबी (गुरूमुखी) में 'सिखों दे राज दीविथिया' और 'पंजाबी बातचीत' जैसी किताबें लिखकर मानो क्रांति ही कर दी। अपनी पहलीही किताब 'सिखों दे राज दी विथिया' से वे पंजाबी साहित्य के पितृपुरुष के रूप मेंप्रतिष्ठित हो गए। इस पुस्तक मे सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे मेंबहुत सारगर्भित रूप से बताया गया था। पुस्तक में तीन अध्याय है। इसके अंतिम अध्यायमें पंजाब की संकृति, लोक परंपराओं, लोक संगीत आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दीगई थी। अंग्रेज सरकार ने तब होने वाली आईसीएस (जिसका भारतीय नाम अब आईएएस हो गयाहै) परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था।
1870 में उन्होंने ओम जय जगदीश की आरतीकी रचना की। प. श्रध्दाराम की विद्वता, भारतीय धार्मिक विषयों पर उनकी वैज्ञानिकदृष्टि के लोग कायल हो गए थे। जगह-जगह पर उनको धार्मिक विषयों पर व्याख्यान देने केलिए आमंत्रित किया जाता था और तब हजारों की संख्या में लोग उनको सुनने आते थे। वेलोगों के बीच जब भी जाते अपनी लिखी ओम जय जगदीश की आरती गाकर सुनाते। उनकी आरतीसुनकर तो मानो लोग बेसुध से हो जाते थे। आरती के बोल लोगों की जुबान पर ऐसे चढ़े किआज कई पीढियाँ गुजर जाने के बाद भी उनके शब्दों का जादू कायम है।उन्होंनेधार्मिक कथाओं और आख्यानों का उध्दरण देते हुए अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जनजागरण काऐसा वातावरण तैयार कर दिया कि अंग्रेजी सरकार की नींद उड़ गई। वे महाभारत का उल्लेखकरते हुए ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने का संदेश देते थे और लोगों में क्रांतिकारीविचार पैदा करते थे। 1865 में ब्रिटिश सरकार ने उनको फुल्लौरी से निष्कासित कर दियाऔर आसपास के गाँवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। जबकि उनकी लिखीकिताबें स्कूलों में पढ़ाई जाती रही।
पं. श्रध्दाराम खुद ज्योतिष के अच्छेज्ञाता थे और अमृतसर से लेकर लाहौर तक उनके चाहने वाले थे इसलिए इस निष्कासन का उनपर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि उनकी लोकप्रियता और बढ गई। लोग उनकी बातें सुनने को औरउनसे मिलने को उत्सुक रहने लगे। इसी दौरान उन्होंने हिन्दी में ज्योतिष पर कईकिताबें भी लिखी। लेकिन एक इसाई पादरी फादर न्यूटन जो पं. श्रध्दाराम केक्रांतिकारी विचारों से बेहद प्रभावित थे, के हस्तक्षेप पर अंग्रेज सरकार को थोड़ेही दिनों में उनके निष्कासन का आदेश वापस लेना पड़ा। पं. श्रध्दाराम ने पादरी केकहने पर बाईबिल के कुछ अंशों का गुरुमुखी में अनुवाद किया था। पं. श्रध्दाराम नेअपने व्याख्यानों से लोगों में अंग्रेज सरकार के खिलाफ क्रांति की मशाल ही नहींजलाई बल्कि साक्षरता के लिए भी ज़बर्दस्त काम किया।
आज जिस पंजाब में सबसेज्यादा कन्याओं की भ्रूण हत्याएं होती है इसका एहसास उन्होंने बहुत पहले कर लियाथा। 1877 में भाग्यवती नामक एक उपन्यास प्रकाशित हुआ (जिसे हिन्दी का पहला उपन्यासमाना जाता है), इस उपन्यास की पहली समीक्षा अप्रैल 1887 में हिन्दी की मासिकपत्रिका प्रदीप में प्रकाशित हुई थी। इसे पंजाब सहित देश के कई राज्यो के स्कूलोंमें कई सालों तक पढाया जाता रहा। इस उपन्यास में उन्होंने काशी के एक पंडित उमादत्तकी बेटी भगवती के किरदार के माध्यम से बाल विवाह पर ज़बर्दस्त चोट की। इसीइसउपन्यास में उन्होंने भारतीय स्त्री की दशा और उसके अधिकारों को लेकर क्रांतिकारीविचार प्रस्तुत किए।
पं. श्रध्दाराम के जीवन और उनके द्वारा लिखी गईपुस्तकों पर गुरू नानक विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के डीन और विभागाध्य्क्ष श्रीडॉ. हरमिंदर सिंह ने ज़बर्दस्त शोध कर तीन संस्करणों में श्रध्दाराम ग्रंथावली काप्रकाशन भी किया है। उनका मानना है कि पं. श्रध्दाराम का यह उपन्यास हिन्दी साहित्यका पहला उपन्यास है। लेकिन यह मात्र हिन्दी का ही पहला उपन्यास नहीं था बल्कि कईमायनों में यह पहला था। उनके उपन्यास की नायिका भाग्यवती पहली बेटी पैदा होने परसमाज के लोगों द्वार मजाक उडा़ए जाने पर अपने पति को कहती है कि किसी लड़के औरलड़की में कोई फर्क नहीं है। उन्होने इस उपन्यास के जरिए बाल विवाह जैसी कुप्रथा परज़बर्दस्त चोट की। उन्होंने तब लड़कियों को पढाने की वकालात की जब लड़कियों कोघरसे बाहर तक नहीं निकलने दिया जाता था, परंपराओं, कुप्रथाओं और रुढियों पर चोट करतेरहने के बावजूद वे लोगों के बीच लोकप्रिय बने रहे। जबकि वह ऐक ऐसा दौर था जब कोईव्यक्ति अंधविश्वासों और धार्मिक रुढियों के खिलाफ कुछ बोलता था तो पूरा समाज उसकेखिलाफ हो जाता था। निश्चय ही उनके अंदर अपनी बात को कहने का साहस और उसे लोगों तकपहुँचाने की जबर्दस्त क्षमता थी।
हिन्दी के जाने माने लेखक और साहित्यकार पं. रामचंद्र शुक्ल ने पं. श्रध्दारामशर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है।पं.श्रध्दाराम शर्मा हिन्दी के ही नहीं बल्कि पंजाबी के भी श्रेष्ठ साहित्यकारोंमें थे, लेकिन उनका मानना था कि हिन्दी के माध्यम इस देश के ज्यादा से ज्यादा लोगोंतक अपनी बात पहुँचाई जा सकती है। पं. श्रध्दाराम का निधन 24 जून 1881 को लाहौर मेंहुआ।
द जापान टाइम्स से .जापान की दोकंपनियों द्वारा हाल ही में अंग्रेजी को अपनी व्यापारिक भाषा बनाने के फैसले पर कईतरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अंग्रेजी अबविश्व भाषा बन चुकी है और वैश्वीकरण के दौर में अंग्रेजी में संवाद कर पाना बहुतजरूरी हो गया है।यदि जापान की सरकार अपने देश की प्रोफाइल कोअंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने को लेकर गंभीर है तो उसे अंग्रेजी सिखाने कीबेहतर प्रणालियों और अंग्रेजी में अधिक से अधिक अनुवाद पर भी ध्यान केंद्रित करनाचाहिए।
हालांकि अंग्रेजी से जापानी में अनूदित किताबों की संख्या जापानी सेअंग्रेजी में अनूदित किताबों की तुलना में कहीं ज्यादा है। जापान की कॉमिक्स और बालसाहित्य जैसी विधाओं ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की है।जापान केप्रकाशकों ने 60 और 70 के दशक में अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में बाल साहित्य काप्रसार करना शुरू किया था और अब तीन हजार से ज्यादा जापानी किताबें दुनियाभर केदेशों में अनूदित की जाती हैं। चीन से व्यावसायिक संबंधों में सुधार आने के बादकेइगो हिगाशिनो जैसे लेखकों की किताबें चीन में भी लोकप्रिय हुई हैं। हारुकीमुराकामी की किताब वनक्यू८४ तो चीन में बेस्ट सेलर साबित हुई है।
हालांकिइस किताब के अनुवाद की शैली पर बहस जारी है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि अनुवादके जरिए दुनियाभर के लोगों तक पहुंचा जा सकता है। चाहे अनुवाद अंग्रेजी या चीनी मेंकिया गया हो या किसी अन्य भाषा में।- ‘द जापान टाइम्स’ जापान का प्रमुखअंग्रेजी अखबार है।
हिन्दीदिवसपर हर बार की तरह कुछ परंपरागत किस्म की खबरों से आपका साबकाहोने ही वाला है। हिन्दी के खात्मे का मर्सिया पढ़ने और हिन्दी को बचाने के नाम परचिंतन की सिर फुटौव्वल करने वाली गतिविधियां, चर्चा, परिचर्चाओं से संचार माध्यमअटने ही वाले हैं। अगले कुछ दिन हिन्दी के नाम पर आंसू बहाने वाले लोग हर ओर दिखनेही वाले हैं। लेकिन असली सवाल इनरस्मी गतिविधियों के बीच कहीं गुम है, क्या हमारीहिन्दी मरणासन्न है? क्या सचमुच हिन्दी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है?
जवाब है बिलकुल नहीं। कम से इस सदी की ताकत के रूप में देखे जा रहे देश केभविष्य़ को देखते हुए तो बिलकुल नहीं। इस शक्तिशाली, संभावनाशील औऱ हमारे बड़े बाजारको देखते हुए तो कतई नहीं, क्योंकि पूरे देश में सहज संचार के लिए आज भी हिन्दी काकोई विकल्प नहीं है। इसे एक तथ्य के नजरिए से देखिए...आज के वैश्वीकृत बाजार का मूल मंत्र- थिंक ग्लोबल, गो लोकल - भी हिंदी के पक्षमें खड़ा है। शायद इसीलिए कुछ अमेरिकी बिजनेस स्कूल हिंदी सिखाने की पहल भी शुरू करचुके हैं। कंपनियां हिन्दी पर जोर दे रही हैं। कई विदेशी विश्वविद्यालय हिन्दी मेंकोर्स शुरू कर रहे हैं। तकनीकी प्रगति और इंटरनेट भी इसके विस्तार में सहायक हो रहाहै। ‘गूगल ट्रांसलेट’ के जरिए हिंदी से अंग्रेजी ही नहीं, बल्कि विश्व की कई भाषाओंका दोतरफा अनुवाद संभव हो गया है। इसीलिए हिन्दी भले ही अपने घर में उपेक्षित है, लेकिन इसका विस्तार जारी है। कुछ देशों में जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा इसे बोलताहै। दुनिया के कोने-कोने में पहुंचकर हिन्दी 62 करोड़ लोगों की जुबान बन गई है।जहां विश्व में कईभाषाओं को बोलने वाले अंगुलियों में गिने जा सकते हों, वहां एकभाषा को आधा अरब से ज्यादा लोग बोलते हैं। ऐसे में इसके मरणासन्न होने की बात कैसेकी जा सकती है।
लेकिन इन ठोस तथ्यों के बीच फिर क्यों हमें लगता है कि हिन्दी की हैसियतदोयम दर्जे की है, इसके साथ कहीं कुछ ठीक नहीं चल रहा है? तो कहीं इसकाजवाब ढूंढाजा सकता है हमारी औपनिवेशिक मानसिकता में, इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दिला पाने मेंविफल सरकारी प्रयास में....आइए कुछ पहलुओं पर नजरडालते हैं...यूं तो महात्मा गांधी और महेश भट्ट में कोई समानता नहीं है। बिल्कुल भीनहीं। बस हिंदी के बारे में भट्ट शायद गांधी के अनुयायी लगते हैं। गांधी कहते थे-राष्ट्रभाषा के बिना देश गूंगा है। और भट्ट को लगता है कि हिंदी से नाम और पैसाकमाने वाले फिल्म-टीवी के सितारों के मुंह हिंदी के नाम पर बंद हो जाते हैं। इसकेपीछे उनकी गुलामी की मानसिकता ही है, जोसंवाद के लिए विदेशी भाषा की मोहताज है।
दूसरा, सरकारी प्रयासों में दृढ़ता की कमी। गांधी जी क्षमा करें, हिंदीराष्ट्रभाषा आज भी नहीं है। उसे कुछ राज्यों में राजभाषा का दर्जा जरूर मिला है, लेकिन देश का कामकाज अंग्रेजी में चल रहा है। हिन्दी को आजादी के 10 साल के भीतरराष्ट्रभाषा बनना था। आज 60 साल गुजर गए हैं।सहज प्रश्न है - क्या इस वजह से हम शिक्षा-साक्षरता में पिछड़ गए? शायद हां।कारण, विश्व के जिन देशों में 99 फीसदी तक साक्षरता है वहां कासरकारी काम-पढ़ाईस्थानीय भाषा में होती है। चीन, जापान, रूस, फ्रांस आदि विकसित देश सरकार और शिक्षाको अपनी ही भाषा में बेहतर ढंग से चला रहेहैं। दूसरी ओर, भारत समेत जिन देशों मेंसाक्षरता दर कम है, वहां अंग्रेजी या अन्य औपनिवेशिक भाषाओं का दबदबा है।
तो, क्या हिंदी अब सिमटती जा रही है? इसका जवाब थोड़ा चौंकाने वाला है। हम सबदेख रहे हैं, केंद्र-राज्य सरकारें कठिन-भारी भरकम शब्दों के बोझ तले हिंदी को दबाएबैठीं हैं। मीडिया, फिल्म-टीवी वालों को बोलचाल की हिंदी (हिन्दुस्तानी) का प्रयोगकरने पर शुद्धतावादी भाषा पंडित कोस रहे हैं। पर बाजार का गणित कुछ और ही है।अभीव्यापारिक विश्व का केंद्र अंग्रेजी बोलने वाले देशों में है। परजैसे ही यहकेंद्र चीन-भारत जैसे देशों की ओर सरकेगा, अंग्रेजी की ऐसी प्रभुता नहीं रहेगी। इसेऐसे समझिए, अंग्रेजी की स्थिति मोबाइल सेवा देने वाली कंपनी के ‘बेस्ट प्लान’ कीतरह ही है। डॉलर-यूरो के उतरते ही संवाद के दूसरे 'बेहतर प्लान' लागू हो जाएंगे औरहिन्दी अपने आप केन्द्र में आ जाएगी।
नई दिल्ली/भोपाल.यदि आप यह सोचते हैं कि केवल अंग्रेजी बोलनेसे ही आपको सम्मान मिलेगा तो आप शायद गलत हैं। दैनिक भास्कर डॉट कॉम के देश के 17शहरों में कराए गए सर्वे में 65 फीसदी लोगों ने यह विचार व्यक्त किए। हिंदी दिवस परकराए गए इस सर्वे ने आम हिंदुस्तानी के मन में बरसों से बैठी इस मान्यता को ध्वस्तकर दिया है कि केवल फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना ही कहीं भी आपको सम्मान दिलाने कीगारंटी बन सकता है। हालांकि, सर्वे में चौंकाने वाली यह बात भी निकल कर आई है किसत्तर फीसदी लोग विभिन्न सरकारी और निजी कामों के दौरान भरे जाने वाले फॉर्म मेंहिंदी का विकल्प होने के बावजूद अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं। दिल्ली, मुंबई लखनऊके अलावा मप्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा में हुए इस सर्वे में २१७क् से अधिक लोगोंने भागीदारी की।
इसी तरह एक अन्य प्रoA के जवाब में अधिकांश लोग बच्चों के बेहतर भविष्य के लिएउच्च शिक्षा में भी हिंदी को एक विषय के रूप में रखने के पक्ष में हैं। 57 फीसदीलोगों ने इसमें सहमति जताई है जबकि 25 फीसदी लोग हिंदी को प्राइमरी स्कूल तक हीरखने के पक्ष में हैं।
मीडिया पर हिंदी को विकृत करने के आरोप के प्रoA पर लगभग 48 फीसदी लोगों कामानना है कि इसी बहाने कम से कम हिंदी का प्रसार तो हो रहा है। जबकि 27 फीसदी लोगकहते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हिंज्लिश का प्रयोग बढ़ रहा है।हालांकि २क् फीसदी लोग इसे बेहद खराब मानते हैं। सर्वे में उभर कर आया है कि हिंदीको सर्वाधिक लोकप्रिय बनाने में मीडिया के साथ बॉलीवुड की बहुत बड़ी भूमिका है।हिंदी के प्रसार में सरकारी प्रयासों को लोग लगभग नगण्य मानते हैं। 38 फीसदी लोगमीडिया को और 52 फीसदी लोग बॉलीवुड को हिंदी के प्रसार और विस्तार के लिए जिम्मेदारमानते हैं।
इसी तरह देश में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या में खासी बढ़ोतरी के बावजूद भीहिंदुस्तानी बड़े शोरूम, होटलों या हवाई अड्डे के काउंटर पर पूछताछ करने के लिएबेझिझक हिंदी का ही इस्तेमाल करते हैं। लगभग 52 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें ऐसीजगहों पर हिंदी के प्रयोग में शर्म नहीं आती। जबकि 26 प्रतिशत का कहना है कि वेअंग्रेजी को ही तवज्जो देते हैं।
इन शहरों में हुआ शहरों- दैनिक भास्कर डॉट कॉम ने यह सर्वे दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना, रांची, चंडीगढ़, भोपाल, इंदौर, सागर, जयपुर, जोधपुर, अजमेर, कोटा, उदयपुर, पानीपत, हिसार, अमृतसरमें किया गया। इन शहरों में दैनिक भास्कर के रिपोर्टरों ने लोगों से रूबरू होकरउनकी भावनाएं टटोलीं।